फलित ज्योतिष
फलित ज्योतिष
इस कोर्स में आप जन्म कुंडली निर्माण की सम्पूर्ण प्रक्रिया, ग्रहों की सटीक स्थिति निर्धारित करने के नियम, प्रत्येक ग्रह के स्वभाव, शक्ति, दृष्टि और जीवन पर उनके वास्तविक प्रभाव को अत्यंत सरल, आसानी से समझ आने वाली भाषा में गहराई से सीखेंगे, ताकि आप किसी भी कुंडली को आत्मविश्वास के साथ पढ़ और समझ सकें।
कोर्स अवधि :- 50 Days
क्लास माध्यम :- ऑनलाइन / ऑफ़लाइन
शैली :- सिद्धांत + प्रैक्टिकल
कक्षा समय :- सुबह/शाम
भाषा :- हिंदी
आप क्या सीखेंगे?
- 12 भावों का विस्तृत फल
- 12 भावों का विस्तृत फल
- 12 भावों का विस्तृत फल
- 12 भावों का विस्तृत फल
- 12 भावों का विस्तृत फल
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- 12 भावों का विस्तृत फल
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आप क्या सीखेंगे?
ज्योतिष की शुरुआत प्रथम दिवस से होती है, जहाँ विद्यार्थी प्राचीन आचार्यों, प्रमुख ग्रन्थों, ज्योतिष की शाखाओं और वेदों में वर्णित इसकी परिभाषा से परिचित होते हैं। द्वितीय और तृतीय दिवस में ब्रह्मांड की उत्पत्ति, राशियों का नामकरण, नक्षत्रों की संरचना, राशि-स्वभाव, दिशा, वर्ण और तत्वों का अध्ययन कराया जाता है, जिससे कुंडली की नींव समझ में आती है।
चतुर्थ से पंचम दिवस तक काल-पुरुष, 12 भावों और विभिन्न लग्नों की प्रकृति को समझाया जाता है। इसके बाद षष्ठ और सप्तम दिवस में भाव–भावेश, लग्न–लग्नेश, केंद्र-त्रिकोण, ग्रहों की दृष्टि और ग्रहों के स्वभाव का गहन अध्ययन कराया जाता है। अष्टम और नवम दिवस ग्रहों के विचारणीय विषयों और फलित के तीन मूल सिद्धांत—भाव, भावेश और दृष्टि—को स्पष्ट करते हैं।
दशम दिवस में विद्यार्थी कुंडली के वर्गों जैसे होरा और द्वेष्काण का अभ्यास करते हैं, जिससे सूक्ष्म फलादेश की समझ विकसित होती है और आधारभूत ज्योतिष का यह भाग पूर्ण हो जाता है।
इस भाग का आरंभ एकादश दिवस से होता है, जहाँ महादशा, अंतर्दशा और गोचर के प्रभावों की कार्यपद्धति बताई जाती है। द्वादश से चतुर्दश दिवस में लघु पाराशरी के प्रारंभिक श्लोक पढ़ाए जाते हैं तथा सूर्य ग्रह के विभिन्न भावों में फल को विस्तार से समझाया जाता है।
पंद्रहवें से सत्रहवें दिवस के दौरान चन्द्रमा के प्रथम से बारहवें भावों में फल का अध्ययन कराया जाता है, जिससे मन, भावनाओं और मानसिक प्रवृत्तियों के फलित में महारत मिलती है। इसके बाद अष्टादश से विंश (बीसवें) दिवस तक मंगल ग्रह के सभी भावों के परिणामों को लघु पाराशरी सिद्धांतों के साथ समझाया जाता है।
इस प्रकार भाग 2 में विद्यार्थी ग्रहों के फल, शास्त्रीय श्लोकों और दशा-गोचर की तकनीक को एक साथ समझकर भविष्यवाणी की गहरी नींव बना लेते हैं।
इस भाग की शुरुआत बुध ग्रह से होती है, जहाँ एकविंश से तेविंश दिवस तक बुध के प्रथम से बारहवें भावों में मिलने वाले फल को विस्तारपूर्वक सिखाया जाता है। इसके बाद चतुर्विंश से षड्विंश दिवस में गुरु ग्रह के भावफल का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है जिससे ज्ञान, धर्म, संतान और भाग्य संबंधी भविष्यवाणी को समझा जा सके।
सप्तविंश से अष्टाविंश दिवस में शुक्र ग्रह का अध्ययन कराया जाता है, जिसमें विवाह, प्रेम, कला, विलासिता और भौतिक सुखों से जुड़े फल स्पष्ट किए जाते हैं। अंत में त्रिंश से द्वात्रिंश दिवस में शनि ग्रह के सभी भावों में मिलने वाले फल को समझाया जाता है, जिससे आयु, कर्म, बाधाएँ और जीवन-संघर्ष जैसे विषयों पर गहरी पकड़ बनती है।
यह सम्पूर्ण भाग ग्रह-फल को एक व्यवस्थित क्रम में समझाकर विद्यार्थी को फलित-ज्योतिष का वास्तविक तकनीकी आधार प्रदान करता है।
इस भाग में विद्यार्थी राहु और केतु के बारहों भावों में मिलने वाले फल का अध्ययन त्रयस्त्रिंश और चतुस्त्रिंश दिवस में करते हैं, जिससे भ्रम, मोक्ष, बाधा और दैविक प्रभावों को समझने की शक्ति विकसित होती है। पञ्चत्रिंश और षट्त्रिंश दिवस में 12 भावों से बनने वाले प्रमुख योग तथा शास्त्रीय योग जैसे गज-केसरी, शुभकर्तरी, पापकर्तरी, अंगारक, गुरु-चांडाल, बुधादित्य और ग्रहण योग को वास्तविक उदाहरणों सहित पढ़ाया जाता है।
सप्तत्रिंश और अष्टत्रिंश दिवस में विद्यार्थी कालसर्प दोष, मंगल दोष और उनके उपायों का विस्तृत अध्ययन करते हैं। एकोनचत्वारिंश और चत्वारिंश दिवस विवाह मिलान, मांगलिक दोष, गुण मिलान और वैवाहिक संभावनाओं के गहन विश्लेषण पर केंद्रित रहते हैं।
यह भाग विद्यार्थी को योगों, दोषों और सुधारात्मक उपायों की व्यावहारिक समझ प्रदान करता है, जो किसी भी कुंडली विश्लेषण का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
उन्नत अध्ययन की शुरुआत एकचत्वारिंश दिवस से होती है, जहाँ महादशा फलादेश की गहरी तकनीकें सिखाई जाती हैं। द्विचत्वारिंश दिवस में गोचर से फलादेश निकालने की विधि को व्यावहारिक चार्टों पर लागू कराया जाता है। इसके बाद त्रिचत्वारिंश दिवस में ग्रहों के उपायों की सरल से जटिल पद्धतियों को समझाया जाता है।
चतुश्चत्वारिंश से पंचचत्वारिंश दिवस तक पितृ दोष, विवाह योग, प्रेम-विवाह संकेत, तलाक योग और पूर्ण विवाह योग जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता है। छियालीसवें से अड़तालीसवें दिवस में विद्यार्थी कुंडली देखकर शिक्षा-विषय, नौकरी-चयन, व्यवसाय में लाभ-हानि और साढ़े साती के प्रभावों का मूल्यांकन करना सीखते हैं।
अंत में उनचासवें और पचासवें दिवस में राज योग, राज-भंग योग और पूरी कुंडली का समग्र फलादेश करना सिखाया जाता है, जिससे विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से किसी भी कुंडली का संपूर्ण भविष्यवाणी-विश्लेषण करने में सक्षम हो जाते हैं।